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गोंडा भूमि विवाद पर हाई कोर्ट सख्त, जज पर दबाव के आरोप से मचा हड़कंप

गोंडा। गोंडा में 1997 से लंबित भूमि विवाद के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने न्यायिक प्रक्रिया में कथित हस्तक्षेप के आरोपों को गंभीरता से लिया है। मामले में मंडलायुक्त IAS दुर्गा शक्ति नागपाल पर संबंधित न्यायिक अधिकारी को फोन कर दबाव बनाने के आरोप लगाए गए हैं। हाई कोर्ट ने प्रथमदृष्टया इसे न्याय प्रशासन में बाधा डालने का मामला माना है और आपराधिक अवमानना की कार्रवाई पर विचार करने की बात कही है।

लंबित मुकदमे में जज को फोन करने के आरोप

मामला गोंडा की नजूल भूमि से जुड़े पुराने विवाद का है। यह विवाद वर्ष 1997 से लंबित बताया जा रहा है। भूमि को लेकर एक स्कूल और नगर पालिका के बीच मुकदमा चल रहा है। वर्तमान में मामला साक्ष्य के चरण में है और संबंधित भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।स्कूल की ओर से आरोप लगाया गया कि अधिकारियों की ओर से न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। इसी दौरान संबंधित न्यायिक अधिकारी से फोन पर संपर्क किए जाने का मामला हाई कोर्ट के सामने आया।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार!

हाई कोर्ट ने लंबित मुकदमे के संबंध में न्यायिक अधिकारी से फोन पर संपर्क किए जाने को गंभीरता से लेते हुए कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्याय प्रशासन में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने प्रथमदृष्टया इसे न्याय प्रशासन में बाधा पहुंचाने वाला कृत्य माना है।

मामले में यह भी सामने आया कि मंडलायुक्त की ओर से न्यायिक अधिकारी को फोन किए जाने के आरोप से पूरी तरह इनकार नहीं किया गया। हाई कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को गंभीर मानते हुए आपराधिक अवमानना की कार्रवाई पर विचार की बात कही है।

1997 से चल रहा है भूमि विवाद

गोंडा का यह भूमि विवाद करीब तीन दशक से लंबित है। नजूल भूमि को लेकर स्कूल और नगर पालिका के बीच विवाद चल रहा है। मामले में स्कूल की ओर से अधिकारियों पर दबाव बनाने का आरोप लगाया गया है। इसी आधार पर वाद को दूसरी अदालत में स्थानांतरित किए जाने की मांग भी की गई। मामला फिलहाल साक्ष्य के स्तर पर लंबित है और भूमि पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश प्रभावी है।

मुख्य न्यायाधीश के निर्देश के बाद होगी आगे की कार्रवाई

हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा है कि आगे की कार्रवाई मुख्य न्यायाधीश के निर्देश के बाद उचित अदालत के समक्ष रखी जाएगी। इस घटनाक्रम के बाद गोंडा का भूमि विवाद अब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया में प्रशासनिक हस्तक्षेप के सवाल से भी जुड़ गया है।

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