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अयोध्या में सपा का ‘मास्टर स्ट्रोक’! पवन पांडेय की उम्मीदवारी से कांग्रेस के लिए सीट पर दावेदारी मुश्किल? गठबंधन से पहले सियासी बिसात बिछी

अयोध्या। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अयोध्या की सियासत में समाजवादी पार्टी ने एक ऐसा दांव चला है, जिसके मायने अब धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं। पूर्व मंत्री और सपा नेता तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय को अयोध्या विधानसभा सीट से प्रत्याशी घोषित किए जाने को पार्टी के भीतर अब महज एक सामान्य घोषणा नहीं, बल्कि संभावित गठबंधन की सियासी रणनीति के तौर पर देखा जाने लगा है।

5 अगस्त 2026 को लखनऊ में आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अयोध्या विधानसभा सीट से पवन पांडेय की उम्मीदवारी का ऐलान किया था। उस समय इस घोषणा ने पार्टी के नेताओं और राजनीतिक हलकों को चौंकाया था। वजह यह थी कि अयोध्या सीट से पवन पांडेय की दावेदारी लंबे समय से मजबूत मानी जा रही थी। ऐसे में सवाल उठा कि जब टिकट लगभग तय माना जा रहा था तो इतने पहले और एक विशेष सम्मेलन में इसकी घोषणा करने के पीछे आखिर रणनीति क्या है? अब पार्टी के भीतर से निकल रही चर्चाओं ने इस घोषणा को कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन और अयोध्या सीट को लेकर सियासी रणनीति से जोड़ दिया है।

कांग्रेस की नजर अयोध्या पर पड़ी तो बढ़ सकती थी सपा की मुश्किल

सियासी गलियारों में चर्चा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रदेश के करीब 75 जिलों में कम से कम एक-एक सीट पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर जोर दे सकती है। ऐसे में अयोध्या जैसी राजनीतिक और भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण सीट कांग्रेस की प्राथमिकता में आना स्वाभाविक माना जा रहा है। अयोध्या में कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक जमीन और पूर्व सांसद डॉ. निर्मल खत्री के परिवार से संभावित दावेदारी की चर्चाओं ने इस समीकरण को और महत्वपूर्ण बना दिया है। यदि कांग्रेस की ओर से अयोध्या सीट पर मजबूत दावेदारी आती है तो गठबंधन की स्थिति में सीट बंटवारे को लेकर समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती खड़ी हो सकती थी। यही वजह है कि सपा द्वारा गठबंधन की औपचारिक तस्वीर साफ होने से पहले ही पवन पांडेय की उम्मीदवारी घोषित करना अब एक रणनीतिक कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

‘सेफ जोन’ बनाने की रणनीति?

सपा के भीतर चल रही चर्चाओं के मुताबिक, पवन पांडेय की उम्मीदवारी पहले घोषित कर पार्टी ने अयोध्या सीट को अपने खाते में सुरक्षित करने का संदेश दे दिया है। यानी भविष्य में कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत होती है तो अयोध्या विधानसभा सीट पर समझौते की गुंजाइश कम रहे। इसी रणनीति को पार्टी के कुछ नेता ‘मास्टर स्ट्रोक’ के रूप में देख रहे हैं। हालांकि यह अभी राजनीतिक विश्लेषण और पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं पर आधारित आकलन है। सपा और कांग्रेस के बीच 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर गठबंधन की अंतिम तस्वीर और सीटों का बंटवारा होने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

2024 के लोकसभा चुनाव ने बढ़ाई कांग्रेस की दावेदारी

इस पूरे सियासी समीकरण को समझने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालना जरूरी है। अयोध्या मंडल की पांच लोकसभा सीटों में अमेठी और बाराबंकी पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। इसके अलावा कांग्रेस ने रायबरेली, सीतापुर, सहारनपुर और प्रयागराज जैसी सीटों पर भी जीत हासिल की थी।

अमेठी कांग्रेस की ऐतिहासिक राजनीतिक विरासत वाली सीट रही है। यहां से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी चुनाव लड़ चुके हैं, जबकि राहुल गांधी भी अमेठी का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ऐसे में अयोध्या मंडल के जिलों में कांग्रेस की विधानसभा स्तर पर दावेदारी को पूरी तरह खारिज करना सपा के लिए आसान नहीं होगा।

लोकसभा गठबंधन का विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा असर

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। कांग्रेस को गठबंधन में 17 लोकसभा सीटें मिली थीं। इनमें सहारनपुर, अमरोहा, फतेहपुर सीकरी, कानपुर, झांसी, बाराबंकी, देवरिया, बांसगांव और वाराणसी जैसी सीटें शामिल थीं। कांग्रेस की पारंपरिक पारिवारिक सीटों रायबरेली और अमेठी को भी गठबंधन में उसके हिस्से में रखा गया था। कांग्रेस ने 2024 में छह लोकसभा सीटों—अमेठी, रायबरेली, सीतापुर, सहारनपुर, बाराबंकी और इलाहाबाद—पर जीत दर्ज की थी।

लोकसभा चुनाव में गठबंधन की सफलता के बाद अब निगाहें 2027 के विधानसभा चुनाव पर हैं। विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे का फॉर्मूला क्या होगा, यह तय होना बाकी है। लेकिन अयोध्या विधानसभा सीट पर सपा की ओर से पवन पांडेय की उम्मीदवारी की समय से पहले घोषणा ने संकेत जरूर दे दिया है कि पार्टी इस सीट को लेकर किसी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है।

अयोध्या में गठबंधन से पहले ही सियासी शतरंज

अयोध्या विधानसभा सीट सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में बेहद अहम राजनीतिक केंद्र है। ऐसे में यहां प्रत्याशी की घोषणा को लेकर उठे सवाल अब गठबंधन की राजनीति से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं। अगर सपा-कांग्रेस गठबंधन 2027 में आगे बढ़ता है तो सबसे दिलचस्प सवाल यही होगा कि अयोध्या सीट किसके हिस्से में जाती है? पवन पांडेय की पहले से घोषित उम्मीदवारी ने सपा का रुख काफी हद तक साफ कर दिया है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इस सीट पर अपना दावा कितना मजबूत करती है और गठबंधन की बातचीत में सपा अयोध्या को अपने पास बनाए रखने में कितनी सफल होती है। फिलहाल इतना जरूर है कि गठबंधन की बातचीत शुरू होने से पहले ही अयोध्या की सियासी बिसात पर सपा ने अपनी पहली चाल चल दी है।

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