नई दिल्ली। भारत की राजधानी नई दिल्ली शनिवार से दुनिया की बड़ी वैश्विक शक्तियों के महामंच में बदल गई है। भारत की अध्यक्षता में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को भारत मंडपम में आयोजित हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में होने वाले इस सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान समेत BRICS के सदस्य और साझेदार देशों के शीर्ष नेता हिस्सा ले रहे हैं।
भारत ने इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता के लिए “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” यानी लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास को केंद्र में रखा है। सम्मेलन का फोकस केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक शासन, शांति, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन और विकासशील देशों की भूमिका जैसे मुद्दे भी एजेंडे में हैं।
21 देशों का परिवार, बढ़ा BRICS का वैश्विक प्रभाव
BRICS के शुरुआती पांच देशों—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका—के बाद समूह का लगातार विस्तार हुआ है। अब सदस्य देशों के साथ साझेदार देशों को मिलाकर इसका परिवार 21 देशों तक पहुंच गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS Business Forum में कहा कि 2006 में चार देशों से शुरू हुआ यह समूह आज सदस्य और साझेदार देशों को मिलाकर 21 देशों का परिवार बन चुका है।
इस विस्तार ने BRICS को वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती से उठाने वाला महत्वपूर्ण मंच बना दिया है। सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष, व्यापारिक तनाव, प्रतिबंधों और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में बदलाव जैसी चुनौतियों से गुजर रही है।
मोदी-पुतिन मुलाकात ने बढ़ाई रणनीतिक गर्माहट
शिखर सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अहम द्विपक्षीय बैठक हुई। दोनों नेताओं ने राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और कौशल क्षेत्र में सहयोग की समीक्षा की। दोनों पक्षों ने व्यापार और औद्योगिक सहयोग बढ़ाने के लिए आर्थिक सहयोग कार्यक्रम-2030 को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया।
यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों पर भी दोनों नेताओं ने विचार साझा किए। प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर भारत के उस रुख को दोहराया कि संघर्षों का समाधान संवाद और कूटनीति के जरिए होना चाहिए। पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी को रूस में होने वाले अगले भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया, जिसे मोदी ने स्वीकार कर लिया।
चीन के साथ रिश्तों पर भी दुनिया की नजर
BRICS सम्मेलन का एक बड़ा कूटनीतिक पहलू भारत-चीन संबंध भी है। गलवान के बाद दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय तक तनाव रहा, लेकिन 2024 के सैन्य गतिरोध कम करने के समझौते के बाद संबंधों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिले हैं। व्यापारिक संबंधों में भी तेजी आई है। ऐसे में शी जिनपिंग की दिल्ली यात्रा को भारत-चीन संबंधों के अगले चरण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
BRICS मंच भारत को चीन के साथ संवाद का अवसर देता है, लेकिन भारत के लिए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों को संतुलित रखना भी बड़ी चुनौती है।
ईरान, रूस और पश्चिम एशिया का संकट भी अहम मुद्दा
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मौजूदगी इस सम्मेलन को और महत्वपूर्ण बनाती है। प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन से पहले पेजेश्कियान से मुलाकात कर रणनीतिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता पर चर्चा की थी। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा महत्वपूर्ण विषय हैं।
रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के संकट के बीच BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देशों के बीच साझा रुख कैसे बनाया जाए।
अमेरिका-केंद्रित व्यवस्था के बीच नई आर्थिक ताकत का संदेश
BRICS को लंबे समय से वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में अधिक संतुलन की मांग उठाने वाले मंच के रूप में देखा जाता है। रूस चाहता है कि समूह तकनीक, बुनियादी ढांचे, भुगतान व्यवस्था और निवेश जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक आर्थिक सहयोग को और मजबूत करे। भारत भी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की अधिक भागीदारी पर जोर देता रहा है।
यही वजह है कि दिल्ली सम्मेलन को केवल कूटनीतिक बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में BRICS की भूमिका तय करने वाले मंच के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत ने BRICS अध्यक्षता में नवाचार को बनाया बड़ा हथियार
सम्मेलन के साथ भारत ने तकनीक और नवाचार को भी प्रमुखता दी है। भारत मंडपम में ‘भारत इनोवेट्स एक्सपोजिशन’ में 37 डीप-टेक नवाचार प्रदर्शित किए जा रहे हैं। इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सर्वाइकल कैंसर जांच, तैरती सौर ऊर्जा प्रणालियां, समुद्री रोबोटिक्स और दुर्लभ-मृदा रहित इलेक्ट्रिक पावरट्रेन जैसी तकनीकें शामिल हैं।
इससे भारत BRICS को केवल राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि तकनीक, स्टार्टअप, अनुसंधान और निवेश के नए सहयोग मंच के रूप में भी स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए सबसे बड़ा मौका क्या?
इस सम्मेलन में भारत के सामने तीन बड़े अवसर हैं—
पहला, ग्लोबल साउथ की आवाज को एक मजबूत साझा मंच देना। दूसरा, रूस, चीन, ईरान और अन्य देशों के साथ संबंधों को संतुलित रखते हुए भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करना। तीसरा, व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आपूर्ति शृंखला के क्षेत्र में नए समझौते और सहयोग के रास्ते खोलना।
भारत सरकार के मुताबिक उसकी BRICS अध्यक्षता के दौरान 50 से अधिक व्यावहारिक परिणाम सामने आए हैं। हालांकि, सभी सदस्य देशों की सहमति से संयुक्त घोषणा को लेकर अभी अंतिम तस्वीर स्पष्ट नहीं है।
दुनिया की नजर अब दिल्ली पर
दिल्ली में हो रहा 18वां BRICS सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। रूस और चीन की बढ़ती सक्रियता, पश्चिम एशिया का संकट, अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव और विकासशील देशों की आर्थिक जरूरतों के बीच भारत को इस सम्मेलन में संतुलनकारी भूमिका निभानी है।
इसलिए भारत मंडपम में होने वाली बैठकों का असर केवल BRICS देशों तक सीमित नहीं रहेगा। सम्मेलन से निकलने वाले फैसले आने वाले समय में वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में शक्ति-संतुलन की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।