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Gorakhpur News: विदेशी आक्रांताओं ने भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने की कोशिश की, अब प्रमाण और तकनीक से दुनिया तक पहुंचाएं विरासत: सीएम योगी

गोरखपुर। मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत पर विदेशी आक्रमणों का उद्देश्य केवल देश का वैभव लूटना नहीं था, बल्कि उसकी समृद्ध ज्ञान परंपरा और बौद्धिक विरासत को कमजोर करना भी था। मंदिरों पर हुए हमलों को भी उन्होंने इसी व्यापक संदर्भ से जोड़ते हुए कहा कि ब्रिटिश काल में तरीका बदला और भारतीयों को अपनी परंपराओं, मूल्यों और जड़ों से दूर करने के लिए भ्रम पैदा किया गया। अब समय है कि भारत अपनी ज्ञान परंपरा को प्रमाणों के साथ सामने रखे और आधुनिक तकनीक के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाए।

मुख्यमंत्री गुरुवार को गोरखनाथ मंदिर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित सप्तदिवसीय पुण्यतिथि समारोह के व्याख्यान सत्र को संबोधित कर रहे थे। दोनों महंतों की पुण्यतिथि पर गोरखनाथ मंदिर में 24 से 30 सितंबर तक श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जा रहा है।

मंदिरों पर हमले के पीछे ज्ञान परंपरा पर प्रहार की सोच

सीएम योगी ने रामायण काल के दंडकारण्य का उल्लेख करते हुए कहा कि ऋषियों के आश्रमों पर होने वाले हमलों से लेकर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण तक, भारत की संपदा के साथ उसकी ज्ञान परंपरा को नुकसान पहुंचाने के प्रयास होते रहे। उन्होंने सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण का उदाहरण देते हुए कहा कि मंदिरों पर हमले को केवल लूटपाट के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके पीछे सनातन परंपरा को कमजोर करने की सोच भी थी।

अंग्रेजों ने बदला तरीका, भारतीयों को अपनी जड़ों से दूर किया

मुख्यमंत्री ने कहा कि ब्रिटिश काल में भारत को कमजोर करने का तरीका बदला गया। भारतीयों को अपनी भाषा, चिकित्सा पद्धतियों और पारंपरिक ज्ञान को लेकर भ्रमित किया गया। उनके अनुसार संस्कृत के स्थान पर अंग्रेजी और परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों के स्थान पर आधुनिक चिकित्सा को प्राथमिकता मिलने से धीरे-धीरे भारतीय समाज अपनी परंपरा और जड़ों से दूर होता गया।

यह मुख्यमंत्री का ऐतिहासिक और वैचारिक आकलन था। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करने पर जोर दिया।

तक्षशिला-नालंदा से काशी और उज्जैन तक ज्ञान की परंपरा

सीएम योगी ने कहा कि भारत की पहचान उसकी ज्ञान परंपरा के कारण रही है। उन्होंने तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों के साथ काशी, उज्जैन, कांची और नवद्वीप का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि भारत में ज्ञान-विमर्श की परंपरा केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं थी। कुंभ जैसे आयोजनों में भी संतों और विद्वानों के बीच शोध, विचार और नवाचार पर चर्चा होती थी। भारतीय समाज ने आज भी अपने पर्व, त्योहार और मांगलिक कार्यों को पंचांग की परंपरा से जोड़े रखा है।

एक लाख से अधिक पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटाइजेशन का उल्लेख

मुख्यमंत्री ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, काशी में संरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां एक लाख से अधिक पांडुलिपियां एकत्र की गई हैं और उनके संरक्षण व डिजिटाइजेशन का कार्य चल रहा है।

उन्होंने कहा कि परिवारों, विद्वानों के घरों, प्राचीन मठों और मंदिरों में भी बड़ी संख्या में ज्ञान की धरोहर मौजूद है। अयोध्या, प्रयागराज, मथुरा-वृंदावन और लखनऊ समेत विभिन्न स्थानों से पांडुलिपियां, ताम्रपत्र और शिलालेख मिलने का भी उन्होंने उल्लेख किया।

‘सत्य के साथ प्रमाण भी रखना होगा’

सीएम योगी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को दुनिया के सामने रखते समय केवल दावे करना पर्याप्त नहीं होगा। जो बात कही जाए, उसे प्रमाणित करके प्रस्तुत करना होगा।

उन्होंने कहा कि ज्ञान परंपरा को लेकर विरोध और दुष्प्रचार की स्थिति में तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। डिजिटल माध्यमों और आधुनिक तकनीक के जरिए प्राचीन ज्ञान को प्रमाणों के साथ संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है।

पाणिनि, पतंजलि और चाणक्य की विरासत से परिचित हो नई पीढ़ी

मुख्यमंत्री ने कहा कि भाषा और व्याकरण से लेकर अर्थशास्त्र, विज्ञान, खगोल, आयुर्वेद, शिल्प और तकनीक तक भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा रही है। नई पीढ़ी को पाणिनि, पतंजलि, आयुर्वेद के आचार्यों और चाणक्य के अर्थशास्त्र जैसी विरासत से परिचित कराया जाना चाहिए।

उन्होंने नैमिषारण्य का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब तीन हजार वर्ष पहले वहां बड़ी संख्या में ऋषि श्रवण परंपरा से प्राप्त ज्ञान को लिपिबद्ध करने के लिए एकत्र हुए थे।

‘जड़ों से कटकर विकास संभव नहीं’

उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि विकसित भारत की संकल्पना के सूत्र भारतीय ज्ञान परंपरा में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि अपनी जमीन और मूल से कटकर विकास संभव नहीं है।

आईआईटी बीएचयू के प्रो. वी. रामनाथन ने कहा कि भारतीय सभ्यता ने ज्ञान को हमेशा प्राथमिकता दी है। नई पीढ़ी को आधुनिक माध्यमों के जरिए अपनी विरासत से जोड़ने की जरूरत है।

जगद्गुरु स्वामी श्रीधराचार्य ने कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा लोककल्याण का माध्यम बनती है, जबकि जगद्गुरु विश्वेश प्रपन्नाचार्य ने योग को केवल आसन तक सीमित न मानते हुए यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, आसन, ध्यान और समाधि की व्यापक परंपरा का उल्लेख किया।

सात दिन चलेगा पुण्यतिथि समारोह

गोरखनाथ मंदिर में 24 से 30 सितंबर तक सप्तदिवसीय श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जा रहा है। इससे पहले 23 सितंबर से 29 सितंबर तक संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान-यज्ञ शुरू हुआ है। कथा का आयोजन महंत दिग्विजयनाथ स्मृति भवन में किया जा रहा है।

समारोह में भारतीय ज्ञान परंपरा, नशा मुक्ति, लोकतंत्र, संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति तथा गो-सेवा जैसे विषयों पर अलग-अलग सत्र आयोजित किए जाएंगे। 29 सितंबर को महंत दिग्विजयनाथ और 30 सितंबर को महंत अवेद्यनाथ की श्रद्धांजलि सभा होगी। इस दौरान अखंड मानस पाठ और भंडारे का भी आयोजन किया जाएगा।

कार्यक्रम में जगद्गुरु संतोषाचार्य सतुआ बाबा, महंत नारायण गिरि, महंत राजू दास, महंत शेरनाथ, स्वामी नरसिंह दास, महंत राम बालक दास समेत अनेक संत-महात्मा, विद्वान, शिक्षाविद, शिक्षक और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

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