धर्म डेस्क। शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व रविवार, 11 अक्टूबर से शुरू हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की आराधना का विधान है। इसी दिन कलश स्थापना के साथ घरों और मंदिरों में देवी उपासना का शुभारंभ होता है। श्रद्धालु व्रत रखकर, मंत्रों का जाप कर और माता रानी की आरती उतारकर सुख-शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री की उपासना से भक्तों को धैर्य, साहस, दृढ़ संकल्प और जीवन में स्थिरता की प्रेरणा मिलती है। नवरात्रि का यह पहला दिन आध्यात्मिक साधना, आत्मसंयम और सकारात्मक विचारों के साथ पर्व की शुरुआत करने का अवसर भी माना जाता है।
कौन हैं मां शैलपुत्री, जानिए उनके स्वरूप का महत्व
मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। ‘शैल’ का अर्थ पर्वत और ‘पुत्री’ का अर्थ बेटी होता है। इसी कारण देवी के इस स्वरूप को शैलपुत्री कहा गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां शैलपुत्री पूर्वजन्म में राजा दक्ष की पुत्री सती थीं। भगवान शिव के प्रति उनकी अटूट निष्ठा और तपस्या की कथा पुराणों में वर्णित है। अगले जन्म में उन्होंने हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और मां शैलपुत्री के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
मां शैलपुत्री का वाहन वृषभ यानी बैल है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित रहता है। उनका स्वरूप शक्ति, शांति, पवित्रता और अडिग संकल्प का प्रतीक माना जाता है। वृषभ को धर्म और स्थिरता का प्रतीक मानते हुए देवी की आराधना की जाती है।
नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि उनकी उपासना से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहने की प्रेरणा प्राप्त करता है। यह दिन जीवन में अच्छे विचारों, संयम और सकारात्मकता को अपनाने का संदेश भी देता है।
मां शैलपुत्री की पूजा कैसे करें?
नवरात्रि के पहले दिन पूजा की शुरुआत घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई से करनी चाहिए। सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल पर चौकी स्थापित कर उस पर साफ लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। मां दुर्गा अथवा मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। पूजा में श्रद्धा और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।
पूजन की सरल विधि इस प्रकार है—
1. संकल्प लें: पूजा स्थल पर बैठकर मां दुर्गा का ध्यान करें और श्रद्धापूर्वक नवरात्रि पूजन का संकल्प लें।
2. कलश स्थापना करें: परंपरा और पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित करें। कलश में स्वच्छ जल भरें। परंपरा के अनुसार उसमें अक्षत, सुपारी और सिक्का रखा जा सकता है। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते लगाकर ऊपर नारियल स्थापित करें। यदि जौ बोने की परंपरा है, तो मिट्टी के पात्र में स्वच्छ मिट्टी भरकर जौ बोएं।
3. दीपक जलाएं: मां के सामने घी या तेल का दीपक और धूप जलाएं। अखंड ज्योति जलाने वाले श्रद्धालु उसकी सुरक्षा का समुचित प्रबंध करें।
4. मां का पूजन करें: मां शैलपुत्री को जल, रोली, अक्षत, सफेद फूल, पुष्पमाला और फल अर्पित करें। पूजन सामग्री अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार रख सकते हैं।
5. मंत्र जाप करें: मां शैलपुत्री के मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें। इच्छानुसार दुर्गा सप्तशती, देवी स्तुति या दुर्गा चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं।
6. भोग लगाएं: माता को फल, दूध से बनी मिठाई अथवा सात्विक प्रसाद अर्पित करें। मां शैलपुत्री को गाय के घी का भोग लगाने की भी धार्मिक मान्यता है।
7. आरती करें: पूजा के अंत में मां शैलपुत्री की आरती उतारें और परिवार की सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य तथा समृद्धि की प्रार्थना करें। इसके बाद प्रसाद वितरित करें।
यदि किसी कारणवश सभी पूजन सामग्री उपलब्ध न हो, तो श्रद्धापूर्वक जल, पुष्प और फल अर्पित करके भी मां का स्मरण किया जा सकता है। पूजा का मुख्य आधार श्रद्धा, स्वच्छता और सद्भाव है।
मां शैलपुत्री का मंत्र और जाप का महत्व
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना के दौरान उनके सरल मंत्र का जाप किया जाता है।
मंत्र: ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।
इस मंत्र का 108 बार जाप करना प्रचलित धार्मिक परंपरा है। श्रद्धालु अपनी सुविधा और समय के अनुसार मंत्र का जाप कर सकते हैं। पूजा के दौरान मन को शांत रखकर देवी का ध्यान करना और सद्भाव बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।
मां शैलपुत्री की स्तुति के लिए देवी के इस मंत्र का भी पाठ किया जाता है—
या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंत्र जाप से एकाग्रता बढ़ाने, मन को शांत रखने और आध्यात्मिक साधना में ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा मिलती है।
मां शैलपुत्री को क्या भोग लगाएं?
नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री को गाय के घी का भोग लगाने की मान्यता प्रचलित है। इसके अतिरिक्त दूध, दूध से बनी मिठाई, फल और घर में तैयार किया गया सात्विक प्रसाद अर्पित किया जा सकता है।
देवी को सफेद पुष्प अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। हालांकि, भोग और फूलों का चयन परिवार की परंपरा, उपलब्धता और श्रद्धा के अनुसार किया जा सकता है। भोग तैयार करते समय स्वच्छता रखें और प्रसाद में तामसिक सामग्री का प्रयोग न करें।
नवरात्रि में व्रत रखने वाले इन नियमों का रखें ध्यान
नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु नौ दिनों तक व्रत रखते हैं। कुछ लोग पहले और आखिरी दिन व्रत करते हैं, जबकि कई श्रद्धालु अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास रखते हैं।
व्रत रखने वालों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए—
– सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा करें।
– अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करें।
– व्रत के दौरान पर्याप्त पानी पिएं और शरीर की आवश्यकता के अनुसार भोजन करें।
– पूजा स्थल को साफ रखें और प्रतिदिन मां दुर्गा की आराधना करें।
– क्रोध, कटु वचन, छल-कपट और अनावश्यक विवाद से बचने का प्रयास करें।
– जरूरतमंदों की सहायता करें और सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करें।
– घर में सात्विक वातावरण बनाए रखें तथा परिवार के सदस्यों के साथ सद्भाव से रहें।
धार्मिक परंपराओं में नवरात्रि को आत्मसंयम और साधना का पर्व माना गया है। व्रत के नियम अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं। इसलिए अपनी परंपरा के अनुसार नियमों का पालन करना उचित है।
नवरात्रि में क्या करें और क्या न करें?
क्या करें
– प्रतिदिन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का स्मरण और पूजन करें।
– पूजा के दौरान स्वच्छता और श्रद्धा का ध्यान रखें।
– सुबह और शाम दीपक जलाकर आरती करें।
– घर में धार्मिक पाठ, भजन और मंत्र जाप के लिए समय निकालें।
– जरूरतमंद लोगों की सहायता करें और सभी के प्रति सम्मान का भाव रखें।
– यदि अखंड ज्योति जलाएं, तो उसे सुरक्षित स्थान पर रखें और अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखें।
क्या न करें
– पूजा स्थल और आसपास गंदगी न रहने दें।
– भोग तैयार करने में अशुद्धता और असावधानी से बचें।
– व्रत के नाम पर शरीर को अत्यधिक कष्ट न दें।
– अखंड ज्योति को पर्दों, कपड़ों और ज्वलनशील वस्तुओं के पास न रखें तथा उसे बिना निगरानी के न छोड़ें।
– धार्मिक नियमों को लेकर दूसरों पर अनावश्यक दबाव न डालें।
– पूजा-पाठ के दौरान कटु वाणी, ईर्ष्या और विवाद से बचने का प्रयास करें।
ध्यान रहे कि व्रत के दौरान खानपान संबंधी नियमों में क्षेत्रीय और पारिवारिक अंतर हो सकता है। जिन लोगों को किसी बीमारी या दवा के कारण नियमित भोजन की आवश्यकता है, वे उपवास से पहले चिकित्सकीय सलाह लें।
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
पंचांग आधारित प्रकाशित जानकारी के अनुसार, 11 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना का सामान्य शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक बताया गया है। इसके अतिरिक्त अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक बताया गया है। <u>मुहूर्त की गणना स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकती है, इसलिए अयोध्या, बस्ती या अपने क्षेत्र में प्रचलित पंचांग से समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।
कलश स्थापना को नवरात्रि के पूजन का महत्वपूर्ण आरंभ माना जाता है। कलश को मंगल, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक मानकर स्थापित किया जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।
नवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश
शारदीय नवरात्रि केवल पूजा और व्रत का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, सेवा और सद्भाव का अवसर भी है। मां शैलपुत्री की आराधना से पर्व की शुरुआत करते हुए श्रद्धालु शक्ति, धैर्य और दृढ़ संकल्प को जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं।
नवरात्रि का संदेश है कि व्यक्ति अपने भीतर सकारात्मक विचारों को विकसित करे, परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे तथा जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आए। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के साथ श्रद्धालु बुराइयों पर अच्छाई की विजय और धर्म की स्थापना की कामना करते हैं।
मां शैलपुत्री की पूजा के साथ शुरू होने वाला यह पावन पर्व श्रद्धालुओं को भक्ति, आत्मविश्वास और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। मां दुर्गा की आराधना करते हुए भक्त परिवार, समाज और देश में सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण की प्रार्थना करते हैं। जय माता दी।