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चुनावी लोकतंत्र गंभीर संस्थागत संकट में, निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता पर उठाए सवाल: अमन अरोड़ा

चंडीगढ़। पंजाब के उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के प्रदेश प्रधान अमन अरोड़ा ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि देश का चुनावी लोकतंत्र गंभीर संस्थागत संकट से गुजर रहा है। उन्होंने निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता पर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी कि देश को ‘निर्वाचित तानाशाही’ की ओर धकेला जा रहा है।

पंजाब विधानसभा में पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग से जुड़े प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अमन अरोड़ा ने स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के योगदान को याद किया। उन्होंने डॉ. बीआर आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि मतदान का अधिकार कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नागरिकता का मूल आधार है।

अरोड़ा ने दावा किया कि निर्वाचन आयोग के भीतर असहमति की आवाजों को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने ईवीएम और आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों का जिक्र करते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के विश्वास में कमी आने की आशंका गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल सत्ता के बल पर नहीं, बल्कि ईमानदारी और निष्पक्षता से कायम रहता है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का उदाहरण देते हुए अरोड़ा ने कहा कि उन्होंने चुनावों में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए दबाव के बावजूद कड़े कदम उठाए थे। उन्होंने पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का भी उल्लेख किया और कहा कि स्वतंत्र रूप से काम करने वाले अधिकारियों का संस्थाओं से दूर होना चिंता का विषय है।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित वर्ष 2023 के कानून पर सवाल उठाते हुए अरोड़ा ने कहा कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल करने से विपक्ष की भूमिका कमजोर हुई है। उन्होंने उस प्रावधान पर भी आपत्ति जताई, जिसके तहत चयन समिति खोज समिति द्वारा सुझाए गए नामों के अलावा अन्य व्यक्तियों के नामों पर भी विचार कर सकती है। उनके अनुसार, इससे नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का प्रभाव बढ़ने की आशंका है।

अरोड़ा ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार की ओर से विधानसभा में लाए गए प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि संविधान और मतदान के अधिकार की रक्षा करना सभी की जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की आत्मा को बचाने की है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर जनता का विश्वास बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि इसी विश्वास पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था टिकी हुई है।

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