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गुरुग्राम में रोज 10 करोड़ लीटर भूजल का दोहन, हर साल सात सेंटीमीटर नीचे जा रहा जलस्तर

गुरुग्राम। साइबर सिटी गुरुग्राम में तेजी से बढ़ती आबादी और पानी की मांग के बीच भूजल पर बढ़ती निर्भरता ने चिंता बढ़ा दी है। शहर और आसपास के शहरी क्षेत्र में रोजाना करीब 10 करोड़ लीटर यानी 100 एमएलडी से अधिक भूजल का दोहन हो रहा है। इसके चलते वर्ष 2023 से 2026 के बीच यहां भूजल स्तर में औसतन सात सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गिरावट दर्ज की गई है।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट भी गुरुग्राम में भूजल की स्थिति को गंभीर बता चुका है। अदालत के समक्ष पेश जानकारी के मुताबिक शहर के कई इलाकों में भूजल स्तर जमीन की सतह से करीब 40 मीटर नीचे पहुंच गया है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत को बताया गया कि गुरुग्राम में सालाना निकाला जा सकने वाला भूजल उपलब्ध संसाधन की तुलना में करीब दोगुना है। हाई कोर्ट ने स्थिति में तत्काल सुधार के लिए अधिकारियों को ठोस उपाय सुझाने और रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।

पानी की मांग बढ़ी, आपूर्ति में अंतर

गुरुग्राम-मानेसर शहरी क्षेत्र में पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में सेक्टर-1 से 115 तक आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों की पानी की जरूरत करीब 815 एमएलडी है, जबकि बसई और चंदू बुढ़ेड़ा जल शोधन संयंत्रों से करीब 770 एमएलडी पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। इस अंतर को पूरा करने में भूजल स्रोतों की भूमिका बनी हुई है।

नगर निगम क्षेत्र में नहर आधारित पेयजल आपूर्ति बढ़ने के बाद ट्यूबवेल से लिए जाने वाले पानी की मात्रा करीब 100 एमएलडी से घटकर लगभग 60 एमएलडी हुई है। इसके बावजूद नगर निगम के 581 बोरवेल पानी की जरूरत पूरी करने में इस्तेमाल हो रहे हैं। 2031 तक गुरुग्राम-मानेसर क्षेत्र में पेयजल मांग करीब 1,135 एमएलडी पहुंचने का अनुमान है।

उपचारित पानी का पूरा इस्तेमाल नहीं

भूजल पर दबाव कम करने के लिए उपचारित जल के पुन: उपयोग पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन उपलब्ध उपचारित पानी का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा। शहर के सीवेज शोधन संयंत्रों से करीब 408 एमएलडी उपचारित पानी निकलता है, जबकि इसमें से लगभग 202 एमएलडी का ही पुन: उपयोग किया जा रहा है। इसका इस्तेमाल निर्माण कार्य, उद्योग, पार्क, हरित पट्टी, तालाब और सिंचाई जैसे कार्यों में किया जा रहा है।

हाई कोर्ट ने भी जल संकट पर सुनवाई के दौरान उपचारित जल के पर्याप्त उपयोग और सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता के बेहतर इस्तेमाल की जरूरत पर चिंता जताई है। अदालत ने अधिकारियों से भूजल दोहन कम करने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करने को कहा है।

वर्षा जल संचयन और तालाबों से रिचार्ज की कोशिश

भूजल पुनर्भरण के लिए गुरुग्राम में वर्षा जल संचयन ढांचे और तालाबों के विकास पर भी काम चल रहा है। नगर निगम क्षेत्र में पारंपरिक रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम संचालित हैं और नए मॉड्यूलर सिस्टम भी विकसित किए जा रहे हैं। तालाबों को बरसाती नालों से जोड़ने की योजनाओं का उद्देश्य वर्षा के पानी को बहकर निकलने के बजाय जमीन में पहुंचाकर भूजल रिचार्ज बढ़ाना है।

जून 2026 में जीएमडीए ने भी भूजल पुनर्भरण और जलभराव कम करने के उद्देश्य से नए वर्षा जल संचयन ढांचे विकसित करने की योजना शुरू की थी। इसके अलावा उपचारित पानी को पार्कों और पुनर्जीवित तालाबों तक पहुंचाने के लिए सूक्ष्म सीवेज शोधन संयंत्रों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

हाई कोर्ट ने मांगी ठोस रणनीति

भूजल संकट को लेकर हाई कोर्ट ने अधिकारियों से केवल योजनाएं बनाने के बजाय उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया है। अदालत ने गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को संबंधित विभागों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा करने और सुधारात्मक उपायों की रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। जहां जीएमडीए की पेयजल आपूर्ति उपलब्ध है, वहां भूजल दोहन बंद करने की संभावनाएं भी तलाशने के निर्देश दिए गए हैं।

गुरुग्राम में तेजी से हो रहा शहरीकरण, बढ़ती आबादी और पानी की लगातार बढ़ती मांग भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही है। ऐसे में नहर आधारित पेयजल आपूर्ति बढ़ाने, उपचारित पानी के अधिकतम पुन: उपयोग, वर्षा जल संचयन और प्राकृतिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन के साथ भूजल दोहन पर प्रभावी नियंत्रण को संकट से निपटने के प्रमुख उपायों के रूप में देखा जा रहा है।

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