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राजनीतिक शिखर पर सुप्रिया श्रीनेत

महराजगंज। आजकल टीवी डिबेट पर कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत अपने प्रतिद्वंद्वी प्रवक्ताओं को अच्छे से धोती हुई खूब नजर आती हैं। टीवी पर कांग्रेस को इसलिए भी लोग खूब सुन रहे हैं क्योंकि कांग्रेस की ओर से सुप्रिया श्रीनेत होती हैं। बता दें कि राजनीति में कदम रखने से पहले वह भारत सहित देश विदेश की सफलतम पत्रकार भी रही हैं। मौजूदा समय में वह कांग्रेस सोशल मीडिया विभाग की चेयरमैन हैं। हाल ही में उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी में विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में नामित किया गया है। देखा जाए तो वह एक मात्र ऐसी कांग्रेस प्रवक्ता हैं जो अन्य पार्टियों के प्रवक्ताओं के छक्के छुड़ा रही हैं। कांग्रेस हाईकमान के अति आवश्यक मीटिंगों में वे राहुल, सोनिया और प्रियंका गांधी के साथ अक्सर नजर आती रहती हैं।

सुप्रिया श्रीनेत का पैत्रिक आवास यूपी के महराजगंज जिले के फरेन्दा विधान सभा क्षेत्र के गांव जोगिया बारी में है लेकिन उनकी शिक्षा दीक्षा लखनऊ में हुई है। मां श्रीमती विष्णु सिंह इन्हें डाक्टर बनाना चाहती थीं इसलिए इन्होंने नीट की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली लेकिन डाक्टरी की पढ़ाई नहीं की, वे पत्रकार बन गई जिसमें भी ऊंचाइयां हासिल की। राजनीति में आज सुप्रिया श्रीनेत एक ऐसा नाम है जिसको इतने कम समय में इतनी ऊंची राजनीतिक मुकाम हासिल हुआ हो। राजनीति उनके रग रग में है।

उनके दादा जी योगेन्द्र पाल सिंह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। पिता स्व. हर्षवर्धन सिंह पूर्वी यूपी के जाने माने राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने अपने राजनीति की शुरुआत लखनऊ यूनिवर्सिटी से छात्र राजनीति से की थी। वे समाजवादी विचारधारा के थे। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि जमींदार की थी लेकिन वे सर्वहारा सामंत थे। हर्षवर्धन सिंह के पिता स्व योगेन्द्र पाल सिंह जमींदार परिवार से भले थे, वे जीवन पर्यन्त गरीबों मजदूरों के लिए लड़ते रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजों के तमाम प्रलोभनों को लात मार दिए और उनके खिलाफ किसी भी आंदोलन में जान जोखिम में डालकर सदैव अग्रणी भूमिका में रहे। गरीबों और मजदूरों के प्रति दया भाव ऐसी थी कि वे खेतों में खुद ही हल संभाल लेते ताकि मजदूर कुछ पल के लिए विश्राम कर सके।

ऐसे संघर्ष शील और करूणामयी पिता के पुत्र स्व.हर्षवर्धन सिंह जीवन पर्यन्त अपने पिता के कदमों पर ही चलते रहे। उन्होंने जाने माने मजदूर नेता जार्ज फर्नांडिस के सानिध्य में अपने राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाया। लंबे संघर्षों के बाद 1985 में वे महराजगंज जिले के फरेन्दा विधानसभा क्षेत्र से जनता पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए।

उसके बाद 1989 में जनता दल से महराजगंज संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। 1999 में उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन की और 2004 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़े। यद्यपि कि यह चुनाव वे हार गए थे लेकिन इस संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस का सूखापन समाप्त करने में कामयाब हुए। मतलब 1985 के बाद से कांग्रेस का उम्मीदवार यहां 20–25 हजार वोट ही पाता रहा। लंबे अरसे बाद बतौर कांग्रेस उम्मीदवार हर्षवर्धन को यहां डेढ़ लाख से ज्यादा वोट हासिल हुए थे। वोटों की इस बढ़त से सोनिया गांधी भी प्रसन्न हुई थीं। हार के बाद भी उन्होंने हर्षवर्धन की पीठ थपथपाई थीं। 2009 के लोकसभा चुनाव में अंततः हर्षवर्धन ने भारी अंतर से जीत हासिल की।

वे दूसरी बार संसद पंहुचे। 2014 का चुनाव आते आते हर्षवर्धन को स्वास्थ्य संकट से गुजरना पड़ा। वे चुनाव हार गए और गंभीर बीमारी के चलते 2016 में उनका निधन हो गया। हर्षवर्धन के निधन के बाद कांग्रेस ने उनकी बेटी सुप्रिया श्रीनेत में कांग्रेस का भविष्य तलाश ली। सुप्रिया भी पत्रकारिता छोड़ कर अपने पिता की विरासत संभालने महराजगंज आ गईं। पिता हर्षवर्धन के निधन के बाद सुप्रिया पूरी तरह टूट गई थीं क्योंकि एक के बाद एक उनके अपने ही असमय साथ छोड़ते चले गए। पिता के निधन के पहले ही उनके इकलौते भाई राज्यवर्धन सिंह की मात्र 40 साल की उम्र में निधन हो गया।

भाई के निधन के कुछ समय पहले ही मां विष्णु सिंह भी साथ छोड़ गईं। सोचिए किसी पर भी विपत्ति का ऐसा पहाड़ टूटा हो तो उसे खुद को संभाल पाना कितना मुश्किल हुआ होगा । सुप्रिया ने खुद को संभाला और पिता की राजनीतिक विरासत संभालने की हिम्मत जुटाई। 2019 में महराजगंज से सुप्रिया को चुनाव लड़ना था। राहुल गांधी और सोनिया ने उन्हें आश्वासन दे रखा था लेकिन जब कंडीडेट की सूची जारी हुई तो पूरा महराजगंज चौंक उठा क्योंकि उसमें सुप्रिया की जगह तनुश्री का नाम था। तनुश्री पूर्वांचल के राजनीतिक खिलाड़ी अमर मणि त्रिपाठी की बेटी हैं। सुप्रिया खामोश थीं।

दिल्ली में वह कांग्रेस मुख्यालय गईं, वहां उनकी मुलाकात सोनिया गांधी से हुई। उन्होंने चुनाव के बाबत जानकारी चाही तो सुप्रिया ने कहा मैं तो नहीं लड़ रही क्योंकि टिकट किसी और को मिला है। यह सुनकर सोनिया गांधी चौंक गई। कुछ ही देर में तनुश्री का टिकट बदला गया और सुप्रिया श्रीनेत का फाइनल हुआ। 2019 में पहली बार सुप्रिया इतना बड़ा चुनाव लड़ीं, वे हार गईं लेकिन लोगों के दिलों में घर बना लीं। अब 2024 में सुप्रिया की चुनाव की पूरी तैयारी है, क्या होता है अभी कहना मुश्किल है लेकिन हां यदि उन्हें चुनाव लड़ने का मौका मिला तो कहा जा सकता है कि वे कांग्रेस की बहुत मजबूत उम्मीदवार होंगी।

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