काठमांडू। नेपाल में हालिया प्राकृतिक आपदा के बाद सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों ने तबाही के भयावह पैमाने को उजागर किया है। हिमस्खलन और भारी मलबे के बाद कई इलाकों में अचानक आई बाढ़ ने नदियों का स्वरूप बदल दिया और सड़क, पुल तथा जलविद्युत परियोजनाओं समेत बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) आपदा निगरानी के लिए सैटेलाइट और रिमोट-सेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। ISRO के आधिकारिक रिकॉर्ड में बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की निगरानी से जुड़ी क्षमताओं का भी उल्लेख है।
रसुवा से नुआकोट तक मलबे का सैलाब
उपलब्ध सैटेलाइट विश्लेषण के मुताबिक, नेपाल के रसुवा क्षेत्र में एवलांच के बाद बड़ी मात्रा में मलबा नीचे की ओर आया। इसके चलते जलधाराओं का प्रवाह प्रभावित हुआ और कई स्थानों पर पानी व मलबे ने मिलकर फ्लैश फ्लड का रूप ले लिया। सैटेलाइट तस्वीरों में आपदा से पहले और बाद की स्थिति की तुलना से प्रभावित इलाकों में आए बड़े बदलाव दिखाई देते हैं। नदियों के आसपास जमा मलबे और जलभराव ने स्थानीय स्तर पर खतरे को और बढ़ा दिया है।
दो बड़ी कृत्रिम झीलों ने बढ़ाई चिंता
आपदा के बाद रसुवा क्षेत्र में मलबे से नदी का रास्ता अवरुद्ध होने के कारण बड़े जलभराव की स्थिति बनी। उपलब्ध आंकड़ों में करीब 19 हेक्टेयर और 11 हेक्टेयर क्षेत्रफल की दो जलभराव वाली झीलों का उल्लेख किया गया है। इनमें से एक जलभराव क्षेत्र की लंबाई करीब 944 मीटर तक बताई जा रही है। ऐसी झीलों में पानी लगातार बढ़ने की स्थिति में अचानक टूटने या बहाव तेज होने का खतरा बना रहता है। यही वजह है कि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए ऐसी स्थिति की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
त्रिशूली नदी और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी प्रभावित
भारी मलबे और तेज बहाव का असर त्रिशूली नदी के आसपास के बुनियादी ढांचे पर भी पड़ा है। उपलब्ध सैटेलाइट विवरण में त्रिशूली क्षेत्र की जलविद्युत परियोजनाओं और पुलों को हुए नुकसान की तस्वीर सामने आती है। बताया जा रहा है कि भैंसे आमा ब्रिज समेत महत्वपूर्ण पुलों को भी बाढ़ और मलबे के तेज बहाव से नुकसान पहुंचा। कई स्थानों पर सड़क संपर्क प्रभावित होने से राहत और बचाव कार्यों के सामने भी चुनौती बढ़ी है।
सैटेलाइट तस्वीरें बनीं आपदा की निगरानी का अहम माध्यम
ऐसी प्राकृतिक आपदाओं में जमीन पर पहुंचना मुश्किल होने के कारण सैटेलाइट इमेजरी प्रभावित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ISRO का राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संबंधी तंत्र बाढ़, भूस्खलन और अन्य आपदाओं के आकलन के लिए रिमोट सेंसिंग डेटा का इस्तेमाल करता है। सैटेलाइट से मिले प्री-इवेंट और पोस्ट-इवेंट डेटा के जरिए यह पता लगाने में मदद मिलती है कि नदी का प्रवाह कहां बदला, कितना क्षेत्र जलमग्न हुआ और किन इलाकों में बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा।
नेपाल में आगे भी खतरे पर नजर
विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चिंता उन स्थानों की है जहां मलबे के कारण पानी अस्थायी रूप से रुका हुआ है। यदि इन जलभराव क्षेत्रों में पानी का दबाव अचानक बढ़ता है तो नीचे की ओर तेज बाढ़ आ सकती है। इसलिए प्रभावित इलाकों में जलस्तर, नदी के बहाव और कृत्रिम रूप से बने जलाशयों की लगातार निगरानी जरूरी है।
नोट: उपलब्ध सैटेलाइट विवरण में दिखाई देने वाले नुकसान और जलभराव के आंकड़ों को स्थानीय प्रशासन की ग्राउंड रिपोर्ट से मिलान करना जरूरी है। ISRO की आधिकारिक वेबसाइट पर फिलहाल इस विशेष नेपाल घटना की विस्तृत रिपोर्ट मुझे उपलब्ध नहीं मिली, इसलिए ऊपर दिए गए 19, 11 और 944 मीटर जैसे आंकड़ों को उपलब्ध रिपोर्ट/सैटेलाइट विवरण के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। ISRO की आपदा-निगरानी क्षमता और GLOF मॉनिटरिंग आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज है।