सहारनपुर। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में शनिवार सुबह प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की। कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को तड़के ध्वस्त कर दिया गया। कार्रवाई से पहले इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा। यह कार्रवाई जिला अदालत द्वारा मस्जिद पक्ष की याचिका खारिज कर सिटी मजिस्ट्रेट के पुराने आदेश को बरकरार रखने के बाद हुई है।
जिला कोर्ट ने बरकरार रखा था ध्वस्तीकरण का आदेश
कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर विवाद की शुरुआत प्रशासनिक शिकायत से हुई थी। 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने संबंधित ढांचे को सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे से जुड़ा मानते हुए परिसर खाली करने और निर्माण हटाने का आदेश दिया था। साथ ही करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति का आदेश भी दिया गया था।
मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को जिला अदालत में चुनौती दी थी। जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने सुनवाई के बाद सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी। अदालत के मुताबिक विवादित भूमि सरकारी भूमि है।
1911 के बिजली बिल को लेकर भी उठा सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष की ओर से दावा किया गया कि यह मस्जिद काफी पुरानी है और कलेक्ट्रेट परिसर के मौजूदा स्वरूप से पहले से अस्तित्व में थी। अपने दावे के समर्थन में पक्ष ने 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल, नगर पालिका के रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज अदालत में पेश किए थे।
वहीं सरकारी पक्ष ने इस दस्तावेज की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए। सरकारी अधिवक्ताओं ने अदालत में दलील दी कि बिल की तारीख 1 जनवरी 1911 है, जो रविवार का दिन था। इसके अलावा सरकारी पक्ष ने सहारनपुर में बिजली व्यवस्था के इतिहास से जुड़े रिकॉर्ड पेश करते हुए कहा कि शहर में बिजली 1922 में पहुंची और 1928 से उसका वितरण शुरू हुआ।
पुराने राजस्व रिकॉर्ड भी बने फैसले का आधार
सरकारी पक्ष ने विवादित भूमि से जुड़े पुराने राजस्व अभिलेखों को भी अदालत के सामने रखा। रिपोर्टों के मुताबिक खसरा संख्या 539, ग्राम पठानपुरा की भूमि को पुराने रिकॉर्ड में कचहरी/कलेक्ट्रेट क्षेत्र से जुड़ा बताया गया। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद भूमि को सरकारी माना।
मस्जिद पक्ष ने जमीन को निजी स्वामित्व और वक्फ संपत्ति से जुड़ा बताते हुए दलील दी थी। साथ ही Places of Worship Act, 1991 का भी हवाला दिया गया। हालांकि जिला अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा।
17 तारीखों में पूरी हुई जिला अदालत की सुनवाई
मस्जिद पक्ष ने 20 जुलाई 2026 को जिला अदालत में याचिका दाखिल की थी। इसके बाद मामले में नियमित सुनवाई हुई और करीब 17 तारीखों पर दोनों पक्षों ने अपने दस्तावेज व दलीलें पेश कीं। अदालत ने सितंबर की शुरुआत में अपना फैसला सुनाते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को कायम रखा।
कार्रवाई के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम
अदालती फैसले के बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की। संवेदनशीलता को देखते हुए कलेक्ट्रेट और आसपास के क्षेत्र में पुलिस बल तैनात किया गया। अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर विशेष जोर दिया। मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं और विपक्षी नेताओं ने कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर शिकायत के बाद मार्च 2025 में सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में मामला दर्ज हुआ था। प्रशासन का पक्ष था कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा कर निर्माण किया गया, जबकि मस्जिद पक्ष इसे पुराना धार्मिक ढांचा बताते हुए अपनी जमीन और वक्फ संपत्ति से जुड़े दस्तावेज पेश करता रहा।
16 जुलाई को सिटी मजिस्ट्रेट ने ढांचे को हटाने का आदेश दिया। इसके बाद मस्जिद पक्ष जिला अदालत पहुंचा, लेकिन जिला अदालत ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। अब अदालत के फैसले के बाद प्रशासन ने ढांचे को ध्वस्त कर दिया।