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UP Politics: मायावती का फिर बड़ा फैसला, दीपिका आनंद भी बाहर ईशान को आगे बढ़ाने का ऐलान, BSP में आखिर चल क्या रहा है?

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी में पिछले कुछ दिनों से चल रहा पारिवारिक और संगठनात्मक फेरबदल एक बार फिर सुर्खियों में है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने अब अपने भाई आनंद कुमार की बेटी दीपिका आनंद को भी पार्टी में कोई जिम्मेदारी देने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने अपने भतीजे ईशान आनंद को फिर से पार्टी में सम्मानजनक जिम्मेदारी देकर आगे बढ़ाने की बात कही है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब कुछ ही दिन पहले मायावती ने आकाश आनंद और ईशान आनंद को किसी भी राजनीतिक पद से दूर रखने की घोषणा की थी और दीपिका के लिए भविष्य में जिम्मेदारी की संभावना छोड़ी थी।

मायावती ने अपने ताजा बयान में कहा है कि आनंद कुमार के परिवार से अब केवल ईशान आनंद को ही आगे बढ़ाया जाएगा। वहीं आकाश आनंद और उनकी बहन दीपिका आनंद को पार्टी की किसी भी जिम्मेदारी से दूर रखा जाएगा। मायावती ने यह भी कहा कि ईशान को लेकर अभी उन्हें ऐसी कोई समस्या नजर नहीं आती, जैसी आकाश के मामले में सामने आई, हालांकि उन्होंने भविष्य को लेकर पूरी तरह निश्चित होने से भी इनकार किया है।

12 दिन में बदली तस्वीर, फैसलों की पूरी कहानी

बसपा में मौजूदा घटनाक्रम को समझने के लिए पिछले करीब दो सप्ताह के फैसलों पर नजर डालना जरूरी है।

3 सितंबर को मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक पद से हटाया। इसके बाद 10 सितंबर को उन्हें पार्टी से अलग कर दिया गया। कुछ ही समय बाद संगठन में ईशान आनंद को अहम भूमिका दिए जाने की चर्चा सामने आई।

फिर 12 सितंबर को मायावती ने कहा कि आकाश और ईशान दोनों को पार्टी में कोई राजनीतिक पद नहीं दिया जाएगा। उसी बयान में उन्होंने संकेत दिया था कि जरूरत पड़ने पर दीपिका आनंद अपने पिता आनंद कुमार की सहायता कर सकती हैं।

अब 20 सितंबर को तस्वीर फिर बदल गई। मायावती ने दीपिका को भी किसी संगठनात्मक जिम्मेदारी से दूर रखने का फैसला सुनाया और ईशान आनंद को परिवार से पार्टी में आगे बढ़ाने की बात कही।

मायावती के फैसलों का आधार क्या बताया गया?

मायावती ने अपने फैसलों के पीछे पार्टी हित, अनुशासन और परिवार को राजनीतिक जिम्मेदारियों से अलग रखने की जरूरत को प्रमुखता दी है। उन्होंने अपने ताजा बयान में आकाश आनंद के संदर्भ में उनके विवाह के बाद के रवैये और गतिविधियों का उल्लेख किया तथा उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ के प्रभाव को लेकर भी आरोप लगाए।

ये मायावती के राजनीतिक आरोप और उनका पक्ष हैं। संबंधित लोगों की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, इसलिए इन्हें निर्विवाद तथ्य के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

मायावती ने यह भी कहा है कि बसपा संस्थापक कांशीराम ने अपने रिश्तेदारों को राजनीतिक लाभ देने से दूरी बनाए रखी थी। ताजा फैसले को उन्होंने इसी सोच और पार्टी हित से जोड़कर पेश किया है।

सवाल सिर्फ परिवार का नहीं, संगठन की दिशा का भी

मौजूदा घटनाक्रम ने बसपा की संगठनात्मक शैली और नेतृत्व की उत्तराधिकार व्यवस्था को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं। खासकर इसलिए क्योंकि कुछ ही दिनों के अंतराल में एक ही परिवार के तीन सदस्यों को लेकर अलग-अलग फैसले सामने आए।

आकाश आनंद को पहले बड़ी जिम्मेदारी दी गई, फिर हटाया गया और पार्टी से अलग किया गया। ईशान आनंद को एक समय संगठन में आगे बढ़ाया गया, फिर उन्हें भी राजनीतिक पदों से दूर रखने की घोषणा हुई और अब उन्हें दोबारा आगे बढ़ाने की बात कही गई है। दीपिका आनंद के मामले में भी पहले संभावित जिम्मेदारी का रास्ता खुला और अब उसे बंद कर दिया गया है।

यही वजह है कि बसपा के भीतर नेतृत्व, जिम्मेदारियों और भविष्य की राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चा तेज है। हालांकि, इन फैसलों को लेकर मायावती की ओर से स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उनका आधार पार्टी हित, अनुशासन और अनुभव हैं।

कार्यकर्ताओं के लिए क्या संदेश?

इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए संदेश से जुड़ा है। एक तरफ मायावती परिवार से बाहर के कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ परिवार के अलग-अलग सदस्यों को लेकर लगातार बदलते फैसले संगठनात्मक स्थिरता पर चर्चा को जन्म दे रहे हैं।

ताजा बयान में मायावती ने साफ कहा है कि यदि ईशान आनंद भी भविष्य में कोई गंभीर पार्टी विरोधी गतिविधि करते हैं तो उन्हें भी बाहर किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में आनंद कुमार के परिवार के किसी दूसरे सदस्य को भी कोई छोटी-बड़ी जिम्मेदारी नहीं देने और पार्टी के किसी “मिशनरी और वफादार” कार्यकर्ता को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

इससे एक संकेत यह मिलता है कि मायावती फिलहाल परिवार के भीतर किसी स्थायी उत्तराधिकारी की घोषणा करने के बजाय व्यक्तिगत भरोसे, अनुशासन और पार्टी के प्रति निष्ठा को जिम्मेदारी का आधार बताना चाहती हैं। हालांकि, इसका वास्तविक संगठनात्मक असर आने वाले महीनों में ही स्पष्ट होगा।

23 सितंबर की बैठक पर टिकी नजर

इन फैसलों के बीच बसपा ने 23 सितंबर को लखनऊ में ऑल इंडिया पार्टी बैठक बुलाई है। यह एक महीने के भीतर पार्टी की दूसरी राष्ट्रीय स्तर की बैठक होगी। ऐसे में इस बैठक में संगठन, आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों और हालिया फेरबदल को लेकर क्या दिशा तय होती है, इस पर राजनीतिक नजरें टिकी हैं।

आखिर मायावती की रणनीति क्या दिखती है?

उपलब्ध बयानों और फैसलों को देखें तो अभी तीन बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं—पहली, आकाश आनंद की वापसी का रास्ता मायावती ने फिलहाल बंद किया है; दूसरी, दीपिका आनंद को भी संगठनात्मक जिम्मेदारी से बाहर कर दिया गया है; और तीसरी, परिवार से फिलहाल ईशान आनंद को ही आगे बढ़ाने का विकल्प चुना गया है।

मायावती स्वयं इसे परिवार से ऊपर पार्टी हित को रखने वाला फैसला बता रही हैं। दूसरी ओर, लगातार बदलते फैसलों के कारण बसपा की नेतृत्व व्यवस्था और उत्तराधिकार को लेकर राजनीतिक बहस तेज होना स्वाभाविक है। इसका अगला संकेत 23 सितंबर की राष्ट्रीय बैठक और उसके बाद होने वाले संगठनात्मक फैसलों से मिल सकता है।

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